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शब्द को तौलें फिर बोलें ज़हर न घोलें

Posted On: 21 Dec, 2014 न्यूज़ बर्थ,social issues,Others में

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माँ जिसका एक धर्म एक जड़ एक किताब
जो एक एक करके अपने कोख में नौ माह तक रख कर तीन चार बच्चों को जन्म देती है फिर उन्ही बच्चों में से कोई चोर कोई सिपाही बनता है तो कोई आसाराम तो क्या कहा जाय माँ की ममता का कसूर है या बच्चों के ज्ञान का अब किसको कटघरे में खड़ा किया जाय .
एक आम का पेड़ जिसका एक ही जड़ एक ही मिटटी एक ही माली
जिसके अनेक डाल हर डाल के आम अलग तरह के कुछ में कीड़ा कुछ खट्टे कुछ मीठे कुछ के डाल मोटे कुछ के डाल पतले तो अब किसका कसूर उस गुठली का जिस से पेड़ हुआ या उन डालों का जो पूरी तरह अपने जड़ से ऊर्जा नहीं ले सके .
आज कल कुछ लेखक ऐसे हैं जिन्हे सिर्फ अपने लेख को लिख कर लेख की गिनती बढ़ाने की फ़िक्र है नाम को छपवाने का जनून है न देश की चिंता है न प्रेम की चाहत है. दूसरे के तरफ एक ऊँगली उठा कर बिना सोचे बिना समझे बिना तौले कुछ भी बोल देने लिख देने को लेखक और समाज सुधारक होने का दावा कर लेते है जबकि आज का समय इलेक्ट्रॉनिक मिडिया और प्रिंट मिडिया का है हमने क्या कहा क्या लिखा वो हमारी ज़ुबान से निकली हुयी बात और पेन से लिखे हुए शब्द एक सबूत बन जाते हैं .
ठीक उसी तरह आज यहां इस मंच पर भी कुछ ऐसे भाई हैं जिन्हे सिर्फ लिखना आता है और अपने नाम को छपवाने आता है मगर मालूम नहीं है के ये कलम कितना शक्तिशाली होता है यही कलम है जिस से आग लगायी जाती है यही कलम है जिस से आग बुझाई जाती है यही कलम है जिस से जज किसी को फांसी तक पहुंचता है यही कलम है जिस से किसी को इंसाफ दिलाया जाता है .
कलम कहता है के मैं एक जंगल का खर हूँ : अगर चाहो तो मैं मोती की लर हूँ
आज उसी कलम को आग लगाने की नियत से उठाया जा रहा है नफरत की आंधी को बुलाया जा रहा है सुख शांति को भंग करने की कोशिश की जा रही है कही इस्लाम को बुरा कहा जा रहा है तो कही कुरान को ग़लत कहा जा रहा है तो कही गीता पर शक किया जा रहा है कही धर्म को बदनाम किया जा रहा है तो कही देश के राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की अज़मत शान व बलिदान पर शक किया जा रहा है इसी कलम से रामायण लिखा गया तो इसी कलम से महाभारत भी आज फिर है कोई जो देश की शांति और चैन के खातिर एक नया और सरल रास्ता बनाये आपस में लड़ते हुए भाइयों में सुलह कराये नफरत की आग में जलते हुए देश को प्रेम और शांति का पाठ पढ़ाये सोते हुए भाईयो को जगाये तालीम की रौशनी जलाये हर तरफ से हम एक हैं नेक है नारा लगाये काश आज हमारा कुछ ऐसा करता कुछ ऐसा लिखता के हर तरफ अमन चैन शांति होती प्रेम होता हमारी एक ताक़त होती हम दुनिया में नंबर एक होते हमारे गाओं व मोहल्ले में भी वो खुशहाली होती रौशनी होती तालीम होती हॉस्पिटल होता दुनिया की वो हर चीज़े होतीं जो दिल्ली मुंबई कोल्कता मद्रास या बड़े शहरो में है वो भी एक भारतीय है जिसे मालूम नहीं के धर्म क्या है ज़ात क्या है गीता क्या है कुरान क्या है यहां तक के इंसान क्या है जंगल घर है पेड़ के पत्ते बिस्तर हैं तो नदी का पानी किस्मत है तीर तलवार बंदूक चलाना शौक़ है नाम उनका नक्सली तो कही आतंकवादी तो कहीं चम्बल का डाकू है .
जो आज तक खुद को इंसान नहीं बना सके वो कैसे गीता क़ुरान को समझ सकेंगे कैसे धर्म अधर्म को समझेंगे वो कैसे किसी के दर्द को समझेंगे लोहे पर अगर सोना का पानी चढ़ जाए तो वो सोना नहीं होता लकड़ी पर अगर ताम्बे अगर चांदी का पानी चढ़ जाए तो चांदी नहीं होता शेर की खेल अगर भेड़िया पहन ले तो वो शेर नहीं होता बाबा संत फ़क़ीर का भेस धारण कर लेने से बाबा संत फ़क़ीर नहीं होता ठीक उसी तरह से खुद को कुछ भी कहने से कुछ नहीं होता जब तक वो गुण न हो उसकी पहचान न हो उसका प्रमाण न हो .
इसी लिए मैं कहना चाहूंगा के पहले शब्द को तौलो फिर बोलो ज़हर न घोलो इस लिए के देश का हर नागरिक पहले हिंदुस्तानी है फिर भाई फिर हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई है सबका बाप एक आदम हव्वा सबकी माई हैं .

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nodin के द्वारा
October 17, 2016

Normally I’m against killing but this article slerehtaugd my ignorance.

jlsingh के द्वारा
December 23, 2014

इमाम साहब आपके दर्द को समझ सकता हूँ. बस इतना ही कह रहा हूँ. हुकूमत साथ हो तो नशा कुछ हो ही जाता है अगर भाषा नहीं बदली तो कैसे याद रक्खोगे? और भी बहुत कुछ है जो आप होता

    Imam Hussain Quadri के द्वारा
    December 23, 2014

    यानी आप भी ज़बरदस्ती के ही समर्थक हैं अपने कर्तब्य और प्रेम के पुजारी नहीं यानि जिसकी लाठी उसकी भैंस आपका विचार है इंसान दो तरह से याद किया जाता है एक बुराई से एक अच्छाई से अब जो जिस विचार का होता है उसी तरह अपना नाम लोगों के दिल में बैठाना चाहता है और भी बहुत कुछ है जो जानने के क़ाबिल है समय से आपको पता चल जाएगा

    jlsingh के द्वारा
    December 24, 2014

    आदरणीय कादरी साहब साहब, आपने मेरी प्रतिक्रिया को किस अर्थ में लिया ..मैं न समझ सका… मैंने एक व्यंग्योक्ति कही थी. आज जो लोग अनाप शनाप बोले जा रहे हैं उनके खिलाफ… मैं कट्टरता के खिलाफ हूँ और आपसी सद्भाव बनाये रखने का हिमायती. आप शायद मेरे आलेख को पूरा नहीं पढ़ते हैं. अगर और कोई गलतफहमी हो तो अश्या जाहिर कीजियेगा. अकबर जी की कविता पर भी मैंने अपनी सहज प्रतिक्रिया ही दी थी. मैं समझता हूँ, आपको स्पष्ट हो गया होगा. ! हमसभी यहाँ/इस मंच पर एक दूसरे के आलेखों के माध्यम से ही जानते हैं और आलेख में अपना विचार ही व्यकत करते हैं. मोदी जी के विकास, सफाई और सद्भाव भरी बातों से सहमत हूँ, पर बीच बीच में लोग जो उल्टा-सीधा बयान देते हैं उनका मैं भी विरोध करता हूँ. ..सादर!

    Imam Hussain Quadri के द्वारा
    December 24, 2014

    सिंह जी मैं आप का आभारी हूँ के आपने मेरे मन से मेरी आपके प्रति जो ग़लतफ़हमी थी आपने खत्म कर दिया बहुत बहुत धन्यवाद और कहूँगा के मुझे एकता अखंडता और प्रेम से बहुत प्रेम है इस लिए के ये हमारी पहचान है और हमारी शान और हमारे धर्म इस्लाम का पहला सबक है है इस लिए नहीं के मजबूरी है फिर आपका धन्यवाद .और अगर मेरी बात से आपको तकलीफ हुई हो तो माफ़ी चाहूंगा .

deepak pande के द्वारा
December 21, 2014

Bahut khoob imam,sahab

Shobha के द्वारा
December 21, 2014

श्री इमाम साहब बहुत अच्छा लेख |आपने सूना होगा थोथा चना बाजे घना वही आजकल हाल है जहर घोलने वाले अपना काम करते रहते हैं इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता समाज को बुद्धिजीवी चलाते हैं थोड़े समय की वातें हैं आपने बहुत अच्छे विचार दिए हैं डॉ शोभा


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