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हाय रे राज की नीति

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कितने बदनसीब हैं हम आज अपने ही देश में अपने ही क़ीमती वोटो से बनाये हुए लीडरों की जुबानें हमारे दर्द, बेबसी ,लाचारी , भुखमरी , गरीबी , हत्या , झोपड़ पट्टी , शिक्षा , महंगाई , नौकरी के लिए कभी नहीं खुलतीं , कभी भी इन मुद्दों पर नुक्कड़सभा या रैली नहीं होती , कभी भी इन मुद्दों पर कोई अभियान नहीं चलता , कभी भी गांव देहातों में इनकी सवारी नहीं निकलती गंदे नाले टूटी सड़कें उजड़ी हुयी झोंपड़ी बिना बिजली के अँधेरी गलियों का कभी ख़याल नहीं आता कल जब वोट की ज़रुरत थी तो जो वादे किये थे आज पूछने का समय नहीं देते अगर मिल भी गए तो होगा कह कर चल देते हैं आज तक कुछ शब्द हैं जो इनका हथियार होता है जैसे बड़े बड़े वादे और बड़ी बड़ी बातें जिनका बहुत ही ज़ोर से एलान किया जाता है मगर उनमे से कुछ छोटे मोटे कामों को आने वाले चुनाओ के लिए संभाल कर रख लिया जाता है जिसे चुनाव से पहले एक लोलीपोप की तरह सुहानी और लुभावन काम का एलान करके हमें बेवक़ूफ़ बना दिया जाता है और फिर हमें ठग कर अपनी कुर्सी हासिल कर लेते हैं हम गरीब व मजबूर जनता इनके बहकावे में आकर पांच साल तक इनके ज़ुल्म और ज़बरदस्ती और बेतवज्जहि का शिकार होते रहते हैं .
क्या हमने कभी सोचा है के ये जितनी भी दौलत अपनी कुर्सी को हासिल करने के लिए मिडिया शराब रिश्वत प्रचार और पंडाल और बैनर और झंडे पर खर्च करते हैं अगर उसका दस प्रतिशत एक मोहल्ले या गांव के गरीबों को दान के रूप में भी खर्च कर दें तो पुण्य के साथ साथ बिना मांगे गरीब अपना वोट ख़ुशी से उनके दामन में समर्पित कर देंगे मगर नहीं ऐसा नहीं हो सकता क्यूंकि उन्हें गरीबी और लाचारी देखना अच्छा लगता है जब तक गरीब रहेंगे उनकी हकूमत रहेगी उनके दबदबे कायम रहेंगे उनकी शान उसी वक़्त बढ़ती है जब कुर्सी पर बैठ कर दूसरे बराबरी वाले को किसी गरीब का मज़ाक उड़ा कर अपना रॉब जमाते हैं के देखो मैं भी बड़ा हूँ .
कितने भोले हैं हम के इन राज के नेताओं की नीति को समझ नहीं पाते हम भी उनके मान मर्यादा और बड़े बड़े नामों के तरफ भागते हैं उन्ही पर भरोसा करते हैं अगर कोई गरीबी के दलदल में रह कर गरीब की आवाज़ बनना चाहता है तो उसका हम ख्याल नहीं करते उसे भुला देते हैं उसकी ताक़त और आवाज़ हम नहीं बनते हैं उसकी दिलजोई और हिम्मत को नहीं बढ़ाते हैं ये भूल जाते हैं के जो जन्म से आज तक एक रोटी के लिए नहीं तड़पा एक अच्छे कपडे के लिए नहीं रोया बिजली के इंतज़ार में पूरी रात जग कर नहीं गुज़ारा ज़िन्दगी में कभी भी एक किताब के लिए नहीं तरसा एक लाख रुपैये की अहमियत नहीं समझा दर्द को जाना ही नहीं के क्या होता है ऐसे लोग इन सब तरह की मुसीबतों से गुजरने वाले को कैसे और कब समझेंगे और बदकिस्मती से आजके नेता इन सब परिशानियों से कभी भी दो चार होकर नहीं आये अगर कुछ हैं भी तो उनकी कोई मदद नहीं करता उन्हें उस स्थान तक पहुँचने नहीं देता क्यूंकि आज की सियासत मगरमच्छ के आंसू बहाने , झूट बोलने वाले , दिखावे का दर्द दिखाने वाले , झूटी हमदर्दी करने वाले , झोठे वादे करने वाले ,गरीबों को सीढ़ी बना कर अपनी कुर्सी तक पहुँचने वालों और पल पल बोल कर पलट जाने वालों की है ,
आज हम भी उसी भीड़ शोर ग़ुल और बहुत ही ज़ोरदार प्रचार की सियासत में शामिल हो कर असलियत हक़ीक़त और सच्चाई की आवाज़ को दरकिनार किये जा रहे हैं इंक़लाब और सत्यमेव जयते की ताक़त को भूल बैठे हैं हमारा लीडर कैसा हो किसे अपना लीडर बनायें किसको बागडोर दें किस पर भरोसा करें कौन सच्चा है कौन झूटा है कौन वादे का पाबंद है कौन गरीबों का सही हमदर्द है कौन इन सब इम्तहानों से गुज़र कर गरीबों के काबिल है.
इसकी नहीं तो हमें फ़िक्र है नहीं तो समझ है नहीं तो ज़रूरी समझते हैं नहीं तो इन सब का प्रेरणा देने वाला कोई हमारे साथ है क्यूंकि हमारे यहाँ एक अजीब दस्तूर बन चूका है के हर बड़ी मछली की खुराक छोटी मछली होती है वही आज के हम गरीब भारतीय बड़े बड़े नेताओं के प्यादे हैं जिन्हे वो आसानी से प्रयोग कर अपनी मक़सद को हासिल कर लेते हैं .
क्या इस पार्टी से उस पार्टी में इस मंच से उस मंच पर उछल कूद पार्टी बदलना आवाज़ बदलना नई पार्टियां बनाना अपनी ज़बान से पलटना ये सब क्या है और कैसी नीति है लीडर जिस पार्टी में हो अगर चाहे तो अपना कर्तब्य कहीं से भी निभा सकता है हमारे राष्ट्रपिता बापू ने शुरू से आज़ादी तक कितनी पार्टी बनायीं कितने निशान बदले नहीं एक भी नहीं जो इरादा पहले दिन था जो निशान पहले दिन था जो ताक़त पहले दिन थी उसी में और भी मज़बूती और ताक़त आती गई और मंज़िल को पा लिया आज उसी दिए हुए दौलत को बेरहमी से बर्बाद किया जा रहा है उस आदर्श और सभ्यता और ताक़त को बहुत ही आसानी से खत्म करते हुए अपनी मर्ज़ी के झंडे गाड़े जा रहे हैं उनकी आत्मा भी सोचती होगी के मैं ने किसके हाथ भारत को दे दिया जो आज भारत की शान और इज़्ज़त की परवाह नहीं करता काश आज एक बार और बापू का जन्म होता और दुनिया जान जाती के राजनेता किसे कहते हैं और राज के लिए नीति करने वाले नेता कैसे होते हैं .
सबसे बड़ी बात ये है के हर पद के लिए योग्य उमीदवार देखा जाता है उसकी खोज बिन की जाती है डिग्री और तजरूबे देखे जाते हैं सवभाव और आचरण देखे जाते हैं आगे पीछे की जीवनी ढूंढी जाती है मगर यही एक ऐसा पद है जहाँ सिर्फ ताक़त और पैसा और भीड़ देखि जाती है बाक़ी किसी भी चीज़ की तलाश और खोजबीन नहीं होता जिसके कारण आज के राज की नीति करने वाले नेता बन जाते हैं और हमारे देश और जनता की वाट लगा कर खुद ऐश करते हैं और हर रोज़ हमें ही नए लोलीपोप देकर बहलाते रहते हैं . कब बनेगा हमारा भारत महान भारत और
सरे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा



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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jaylin के द्वारा
October 17, 2016

This is exactly what I was looking for. Thanks for wrgitni!

Jady के द्वारा
October 17, 2016

I’m rellay into it, thanks for this great stuff!

jlsingh के द्वारा
January 18, 2015

बहुत ही सारगर्भित आलेख कादरी साहब! आपने आम लोग और गरीबों के दर्द को उभारा है, नेता लोग भी इन्हे शुरू से आज तक बस केवल वोट बैंक ही समझते रहे हैं. कारण क्या है अशिक्षा और बेरोजगारी इसे कोई दूर भी नहीं करना चाहते …सिर्फ सपने वादे!

Shobha के द्वारा
January 18, 2015

सर बह अपने लिए राजनीति में आते हैं यह आज का सबसे लाभ का बिजनेस है हम आप केवल वोट की ताकत को समझते हैं परन्तु भीड़ नहीं समझती वः वादों को सब कुछ समझती हैं हम आप का वोट नगण्य हो जाता है बहुत अच्छा लेख डॉ शोभा

yamunapathak के द्वारा
January 18, 2015

आपकी बात सच है …..सेवा के लिए लोग राजनीति ही चुन रहे हैं मानो अन्य क्षेत्र से सेवा संभव ही नहीं …पर यह आंशिक सत्य भी है ..शक्ति ही सेवा को प्रभावकारी रूप दे पाती है….सेवा का प्रचार करती है…. एक सशक्त ब्लॉग साभार


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